खुलासा: पहले कार्यकाल में ही परमाणु परीक्षण करना चाहते थे प्रधानमंत्री वाजपेयी

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अटल विहारी बाजपेयी का कार्यकाल

नई दिल्ली। भारतीय राजनीति के इतिहास में 16 मई वह तारीख है जब पहली बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) केंद्र की सत्ता पर काबिज हुआ और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार का गठन हुआ। अपने इस संक्षिप्त कार्यकाल में ही प्रधानमंत्री वाजपेयी परमाणु परीक्षण कर भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों की कतार में खड़ा करना चाहते थे।

दरअसल, भारत को परमाणु संपन्न राष्ट्र बनाने का विचार जनसंघ के मूल में था। भाजपा के गठन के बाद भी पार्टी का यह मानना था कि भारत को घोषित रूप से परमाणु शक्ति संपन्न होना चाहिए। इसके लिए देश के वैज्ञानिक तैयार भी थे किंतु राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में ऐसा नहीं हो पा रहा था और कोई प्रधानमंत्री इसके बारे में फैसला नहीं कर पा रहा था। वर्ष 1974 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पोखरण में परीक्षण किया भी था और कहा था कि शांतिपूर्ण कार्यों के लिए यह परीक्षण किया गया।

वर्ष 1996 में वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने तो उनके लिए यह अवसर था कि जनसंघ और भाजपा के पुराने संकल्प को अमलीजामा पहनाया जाया। उन्होंने इस संबंध में एक सैद्धांतिक फैसला कर भी लिया था। राजनीतिक विश्लेषकों ने उस वक्त इस बात का उल्लेख भी किया था कि वाजपेयी अपने 13 दिन के कार्यकाल में ही परमाणु परीक्षण करना चाहते थे किंतु राजनीतिक नैतिकता का लिहाज करते हुए वह विश्वासमत हासिल करने के बाद ही परीक्षण करने के पक्ष में थे।

दुर्भाग्यवश, बहुमत के आंकड़े के अभाव में उन्होंने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और 1996 में परमाणु परीक्षण होते-होते रह गया। हालांकि, अपने इस संकल्प को वाजपेयी ने दूसरे कार्यकाल में पूरा किया और 13 महीने के दूसरे कार्यकाल में वर्ष 1998 में उन्होंने पोखरण परमाणु परीक्षण को हरी झंडी देकर भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्रों की कतार में खड़ा कर दिया।

वर्ष 1996 में 13 दिन के कार्यकाल के आखिरी दिन बहुमत परीक्षण के दौरान लोकसभा में हुई चर्चा का जवाब देते हुए वाजपेयी ने जो भाषण दिया वह काफी प्रभावी साबित हुआ। तकरीबन घंटे भर के भाषण के बाद वाजपेयी ने बिना बहुमत परीक्षण के ही राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा दे दिया। किंतु, उनका यह भाषण वर्ष 1998 के आम चुनाव में भाजपा के लिए काफी कारगर साबित हुआ।

अपने 13 दिन के पहले कार्यकाल में ही वाजपेयी सरकार ने भविष्य की पटकथा तय कर दी और आने वाली सरकारों ने भी उसका अनुसरण करते हुए निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने का काम किया।

किसी दल को नहीं मिला था बहुमत

1996 में ग्यारहवीं लोकसभा के लिए चुनाव हुए थे। चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला और भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरकर सामने आई। पार्टी ने सबसे ज्यादा 52 सीटें उत्तर प्रदेश में जीती। भाजपा के पास कुछ 161 सीटें थी, जिसमें से 52 उत्तर प्रदेश और 27 मध्यप्रदेश से पार्टी के खाते में आई। जबकि बिहार में भाजपा ने 18 सीटें जीतीं जो 1991 के आम चुनाव से 13 सीटें ज्यादा थी। उधर, महाराष्ट्र से भाजपा की झोली में 16 और गुजरात से 12 सीटें आई। इस चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 140 सीटें मिली और पार्टी दक्षिण में भी पिछड़ गई।

राष्ट्रपति ने वाजपेयी को दिया सरकार गठन का न्यौता

भाजपा सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी और राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। वाजपेयी ने 16 मई को प्रधानमंत्री का पद संभाला लेकिन 13 दिन ही वह प्रधानमंत्री के पद पर रह पाए। बहुमत का आंकड़ा न जुटा पाने की वजह से इस्तीफा देना पड़ा।

तत्पश्चात संयुक्त मोर्चा की सरकार का गठन हुआ और जनता दल के एच. डी. देवगौड़ा ने 1 जून को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। किंतु, वह भी ज्यादा दिन पद पर न रह पाएं और उनकी सरकार में विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने वर्ष 1997 में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। हालांकि, यह सरकार भी ज्यादा दिन न चल पाई और देश को वर्ष 1998 में मध्यावधि चुनाव में उतरना पड़ा।

एनरॉन समझौते को मंजूरी

वाजपेयी सरकार ने पहले कार्यकाल में जो सबसे अहम निर्णय लिया वह एनरॉन समझौते को मंजूरी देना था। यहां से उन्होंने साफ कर दिया कि उनकी सरकार निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने और ज्यादा से ज्यादा रोजगार सृजन के अवसर पैदा करने की दिशा में काम करेगी। वाजपेयी सरकार की सरकारी हस्तक्षेप को कम करने और उदारीकरण की पक्षधर रही। बाद में दूसरे और तीसरे कार्यकाल में वाजपेयी ने इसी नीति को आगे बढ़ाया।

पीपीपी मॉडल की शुरुआत

वाजपेयी ने अगली 13 महीने की सरकार और फिर तीसरे कार्यकाल में निजीकरण उदारीकरण की नीति को तेजी से आगे बढ़ाया। सरकारी और निजी क्षेत्र के (पीपीपी) मॉडल की शुरुआत भी वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में हुई। वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में ही ग्रीन एयरपोर्ट बनाने का काम शुरू हुआ। इसकी शुरुआत हैदराबाद और कर्नाटक से हुई। दिल्ली का इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी राजग कार्यालय में ही शुरू हुआ।

वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते देश में निजीकरण को काफी तेजी से बढ़ाया गया। वाजपेयी ने वर्ष 1999 में अपनी सरकार में विनिवेश मंत्रालय के तौर पर एक नए मंत्रालय का गठन किया और इसका जिम्मा अरुण शौरी को सौंपा। विनिवेश मंत्री शौरी ने भारत एल्यूमिनियम कंपनी (बाल्को), हिंदुस्तान ज़िंक, इंडियन पेट्रोकेमिकल्स कारपोरेशन लिमिटेड और विदेश संचार निगम लिमिटेड जैसी सरकारी कंपनियों को बेचने का काम किया।

इसके साथ ही बीमा क्षेत्र को भी सरकारी कब्जे से बाहर निकालकर, इसमें विदेशी निवेश के लिए द्वार खोले गए। वाजपेयी सरकार के कार्यकाल में बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश की सीमा को 26 फीसदी तक किया था, जिसे 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार ने बढ़ाकर 49 फीसदी तक कर दिया।

राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण, सड़क मार्ग से देश को चारों हिस्से से जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, सर्व शिक्षा अभियान और संचार क्रांति के दूसरे चरण का कार्य वाजपेयी शासन में ही हुआ।