हार कर भी जीत गई बीजेपी, यह चुनाव ममता के लिए एक सबक

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संतोष कुमार। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में टीएमसी पार्टी की विजय हुई है। लेकिन यह विजय भी ममता बनर्जी के लिए इतना आसान नहीं था। बीजेपी की तरफ से उन्हें कड़ी टक्कर मिली। भले ही बीजेपी को विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है लेकिन फिर भी बीजेपी पश्चिम बंगाल में गढ़ बनाने में कामयाब हो गई।

पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम की हाई प्रोफाइल सीट पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हार गईं। उन्हें बीजेपी उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी ने रोमांचक मुकाबले में 1956 वोटों से हरा दिया। यह रणनीतिक रूप से ममता बनर्जी के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। इसके साथ-साथ पश्चिम बंगाल में 3 सीट वाली बीजेपी अब राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है।

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में इस बार सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी पार्टी का हुआ है तो वह कांग्रेस है। बात 2016 के विधानसभा चुनाव की रिजल्ट की करें तो उस समय कांग्रेस के खाते में 76 सीटें थी। 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 1 पर सिमट गई है। यह एक सीट भी उनकी सहयोगी पार्टी की है। कांग्रेस के खाते में 0 सीट आई है।

वहीं तृणमूल कांग्रेस के खाते में 214 सीट इस चुनाव में गई है। 2016 के विधानसभा चुनाव में भी टीएमसी इतनी ही सीटों पर चुनाव जीती थी। यानी टीएमसी के खाते में किसी भी प्रकार का जोड़-घटाव नहीं हुआ है।

बात बीजेपी की करें तो बीजेपी ने इस विधानसभा चुनाव में साल 2016 के मुकाबले शानदार प्रदर्शन किया है। हालांकि कुछ दलबदलू नेताओं की वजह से पार्टी को नुकसान झेलना पड़ा, नहीं तो पार्टी को कुछ और सीटें हासिल हो सकती थीं। 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खाते में 3 सीटें आई थी। 2021 में बीजेपी ने लंबी छलांग लगाते हुए 76 सीटों पर अपना कब्जा जमाया है।

2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने जबरदस्त वापसी की और 38.1 फीसदी वोट हासिल किया। वहीं टीएमसी का वोट प्रतिशत 47.9 और कांग्रेस का वोट प्रतिशत 7.8 फीसदी रहा।

पश्चिम बंगाल के इस विधानसभा चुनाव के बाद राज्य में विपक्ष की भूमिका में कांग्रेस के स्थान पर बीजेपी आ गई है। यह निश्चित ही बीजेपी के लिए किसी जीत से कम नहीं है। जिस राज्य में बीजेपी वर्षों से एंट्री के लिए प्रयास कर रही थी, वहां यह जीत पार्टी के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं। निश्चय ही बीजेपी के लिए पश्चिम बंगाल में अब धीरे-धीरे रास्ते बन रहे हैं।

यह विधानसभा चुनाव ममता बनर्जी के लिए भी किसी सबक से कम नहीं है। नंदीग्राम में सारे शाम-डंड-भेद अपनाने के बाद भी उन्हें हार की मुख देखना पड़ा। उन्होंने लोगों की सहानुभूति बटोरने के लिए चोट और मारपीट का ‘नाटक’ भी किया। कुछ हद तक इसका फायदा भी उन्हें हुआ, लेकिन नंदीग्राम में हार जाना, ममता के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। यह हार निश्चिय ही उन्हें फिर से सोचने पर मजबूर करेगी।

पश्चिम बंगाल में कई मौकों पर ममता बनर्जी सरकार पर अल्पसंख्यक खासकर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगता रहा है। कई मौकों पर ममता बनर्जी पर एक खास वर्ग को संरक्षण देने का भी आरोप लग चुका है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी धार्मिक आधार पर राज्य में भेदभाव पर ममता सरकार को फटकार लगाई थी।

ममता बनर्जी पर आरोप था कि एक खास वर्ग को खुश करने के लिए उन्होंने नवरात्र के मौके पर विसर्जन के दौरान शोभा यात्रा आयोजित करने पर रोक लगा दी थी और तय समय से एक दिन पहले ही जबरन मूर्ति विसर्जन का आदेश दिया था।  हालांकि बाद में कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अपने नियमित समय पर ही मूर्ति विसर्जन किया गया था।

इस सभी घटनाओं ने कहीं न कहीं बंगाल में रहने वाले बहुसंख्यक के मन में ममता सरकार के प्रति नाराजगी और अविश्वास की भावना उत्पन्न की। आज उसी का परिणाम ममता बनर्जी के सामने हैं। उन घटनाओं ने बीजेपी के लिए राज्य में राह को बहुत हद तक आसान किया। भले ही नुकसान कांग्रेस का हुआ हो लेकिन ममता बनर्जी के लिए भी यह देखने का समय है कि सबको साथ लेकर चलने में ही भलाई है। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब लेफ्ट की तरह ही टीएमसी भी खुद को किसी हासिए पर खड़ी पाएगी।

नोट- यह लेखक के निजी विचार हैं, इससे तहकीकात इंडिया का सहमत होना आवश्यक नहीं हैं।