पराक्रम दिवस: 11 बार कारावास हुई, फिर भी बनाई अपनी सेना ‘आजाद हिंद फौज’ और नारा दिया – तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा

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सुभाष चंद्र बोस

आज सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती है। इस दिन को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है। सुभाष चंद्र बोस ने अपनी सेना आजाद हिंद फौज का गठन किया था और आजादी के लिए बिगुल फूंका था। आइए जानते हैं पराक्रम दिवस पर नेताजी की जिंदगी के कुछ अनछुए पहलू के बारें…

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में हुआ था। उनकी माता का नाम प्रभावती और पिता का नाम जानकीनाथ बोस था। उनके पिता जानकीनाथ कटक के बड़े और मशहूर वकील थे।

जानकीनाथ और प्रभावती की कुल 14 संतानें थीं। इनमें से 6 बेटियां और 8 बेटे थे। नेता जी सुभाष चंद्र बोस अपने माता-पिता के नौवीं संतान और भाईयों में पांचवें बेटे थे।

उन्होंने कटक के रेवेनशा कॉलिजियेट स्कूल से अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी की। उसके बाद उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से आगे की पढ़ाई पूरी की। 1919 में बीए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। पूरे यूनिवर्सिटी में उन्हें दूसरा स्थान मिला था।

सुभाष चंद्र बोस के पिता चाहते थे कि सुभाष आईसीएस बने। उन्होंने अपने पिता की यह इच्छा पूरी भी की। 1920 में उन्होंने आईसीएस की परीक्षा दी और उसमें उन्होंने चौथा स्थान पाया, मगर नेता जी का मन अंग्रेजों के अधीन काम करने का नहीं था। जिसके बाद 22 अप्रैल 1921 को उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।

गांधी जी से सुभाष चंद्र बोस की पहली मुलाकात 20 जुलाई 1921 को हुई थी। सुभाष जी गांधी जी की सलाह पर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए काम करने लगे।

अपनी भारत भूमि की आजादी के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर योगदान दिया। बंगाल की भयंकर बाढ़ में घिरे लोगों को उन्होंने भोजन, वस्त्र और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का साहसपूर्ण काम किया था। सामाजिक कार्यों के उन्हें इतना लगाव था कि समाज सेवा का काम नियमित रूप से चलता रहे इसके लिए उन्होंने ‘युवक-दल’ की स्थापना भी की थी।

भगत सिंह को जब फांसी की सजा हुई तो उन्हें रिहा कराने के लिए वे जेल से प्रयास कर रहे थे। उनकी रिहाई के लिए उन्होंने गांधी जी से बात की और कहा कि रिहाई के मुद्दे पर अंग्रेजों के साथ किया गया समझौता तोड़ दें। इस समझौते के तहत जेल से भारतीय कैदियों के लिए रिहाई की मांग की गई थी। लेकिन गांधी जी ने अपना वचन तोड़ने से इंकार कर दिया और भगत सिंह को फांसी दे दी गई। इस घटना के बाद सुभाष चंद्र बोस गांधी जी और कांग्रेस के काम करने के तरीके से बहुत नाराज हो गए थे।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाष चंद्र बोस को कुल 11 बार कारावास की सजा दी गई थी। उन्हें पहली कारावास की सजा 16 जुलाई 1921 को छह महीने की दी गई थी। 1941 में एक मुकदमे के सिलसिले में उन्हें कलकत्ता की अदालत में पेश होना था, तभी वे अपना घर छोड़कर चले गए और जर्मनी पहुंच गए। जर्मनी में नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मुलाकात हिटलर से हुई। वहीं पर उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के लिए ‘आजाद हिन्द फौज’ का गठन किया और युवाओं को ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा भी दिया।

बात 1945 की है जब उनकी मृत्यु का दुखद समाचार मिला था। ऐसा कहा जाता है कि 18 अगस्त 1945 को वे हवाई जहाज से मंचूरिया जा रहे थे। इस सफर के दौरान ताइहोकू हवाई अड्डे पर उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें उनकी मौत हो गई। लेकिन उनकी मौत भारत के इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य है। उनकी रहस्यमयी मौत पर समय-समय पर कई तरह की अटकलें भी सामने आती रही हैं। हालांकि भारत सरकार ने एक RTI के जवाब में इस बात का स्वीकार किया है कि उनकी मौत एक विमान हादसे में हुई थी।

कई अन्य सरकारी तथ्यों के मुताबिक, 18 अगस्त, 1945 को नेताजी हवाई जहाज से मंचुरिया जा रहे थे और इसी हवाई सफर के बाद वो लापता हो गए। जापान की एक संस्था ने उसी साल 23 अगस्त को यह खबर जारी की थी कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस का विमान ताइवान में उतरते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया था जिसके कारण उनकी मौत हो गई थी।